Tuesday, January 15, 2008

पता

आसमान पिघल गया
सूरज की गर्मी से
और धरा को लाज भी नहीं आयी

मुई अमावस को
चाँद के घर चोरी हुई
और चोर के पैरों के निशान ही नहीं !
- टिटहरी चीखती रही
- तारे आँखें मींचे रहे
- रात अपने आँचल में सिमटी रही

चाँद यूँ ही पिघल गया
तारे रोये नहीं
और रात को तो पता भी न चला

नदी बहती रही हवा में
जुगनू अवश्य चौंकते रहे
- इंतज़ार में
पर किसी को कुछ पता नहीं

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