भोथरे हो गए हैं नेजे
या फिर सूख गया है लहू
जो दिखता था हर जगह
पर अब कहीं नहीं
बंद मुट्ठी में
खनकते हैं घिस चुके सिक्के
जो दे गए थे दानदाता
जब चले कहीं नहीं
जिम्मा लिया था रौशनी का
कस्बे के व्यापारियों ने
जल तो गया लहू हमारा
पर जले दिए नहीं
माना कि सूख गयी हैं जड़े
और सिमट गए हैं दायरे
पर ये जो जिस्म हैं तेरे मेरे
क्यों मिले गले नहीं
या फिर सूख गया है लहू
जो दिखता था हर जगह
पर अब कहीं नहीं
बंद मुट्ठी में
खनकते हैं घिस चुके सिक्के
जो दे गए थे दानदाता
जब चले कहीं नहीं
जिम्मा लिया था रौशनी का
कस्बे के व्यापारियों ने
जल तो गया लहू हमारा
पर जले दिए नहीं
माना कि सूख गयी हैं जड़े
और सिमट गए हैं दायरे
पर ये जो जिस्म हैं तेरे मेरे
क्यों मिले गले नहीं
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