उस पार फुटपाथ पर -
तुम खड़ी हो
माथे पर परेशानी कि लकीरें
पता नहीं क्यों?
सभ्यता तो यहाँ भी है
शायद घनी बस्ती की ऊब
कुछ केंचुये
तड़प रहे हैं घिसट रहे हैं सड़क पर
नालियों का पानी रिस आया है
अभी अभी हुई तेज बरसात के कारण
बालकनी पर बैठी बुढ़िया बड़बड़ाती है
गीले हो गए अचार पर
कोसती है बारिश को
और फूंक देती है
अंगीठी में अपने फेफड़े
मचल जाती है मुन्नी
कमरे में भर आये धुंये पर
थपक देती है दादी उसको
"चांदी के कटोरवा में दूध भात ले के आओ... "
पानी अब भी टपक जाता है
रह रह के तुम्हारे बालों से
टूटी खिड़की से
छिटककर आती सूरज की किरणे
पोत देती हें बादलों पे लाल रंग
तुम्हारे गालों पे भी .....
मार लेते हें कुंडलियाँ
धुयें के सांप
घर लौटती शाम पे
कोई जाके दस्तक दे चाँद सपेरे के घर पर
पर कौन?
इस बस्ती में तो
एक बुढ़िया और उसकी पोती है
सुलगती अंगीठी और सिसकती नालियाँ हैं
बिसरती लोरियां और
सुलगते हुए कुछ ठूंठ हैं
कमरे में बंधी अरगनी पे
आत्माएं टंगी हैं, बेबसी के कपडों तले
और खूंटियों पे टंगे हैं
रंग उतर चुके धुआं गए मुखौटे
कोने में संदूक में
ठुंसे हैं ढेर सारे सरोकार
मुँह चिढ़ाते रिश्तों के कारोबार
वो भी हैं इस बस्ती में
जो गिनते रहते हैं
तुम्हारे बालों से टपक जाती बूंदें
और बुनते रहते हैं
एक कहानी अपने आसपास
बस जिंदा रहने के लिए ही
फुटपाथ पर इस पार
1 day ago
2 comments:
nice one
bahut acchi
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