Sunday, October 21, 2007

इतिहास गवाह

दम तोड़ती परछाइयां
बस यही ज़िंदा हैं
मर गए वो जो जीना चाहते थे

जो गवाह थे
अब इतिहास हैं

विभीषिकाएं तो निश्शब्द नहीं
क्रंदन अवश्य निश्शब्द और निर्लज्ज ठहरे
लौट आते हैं प्रतिध्वनियों की तरह

यहाँ वहाँ रक्तपात तो
बारिश में धुल ही जायेंगे
फिर कौतूहल किस बात का
यह तो आपस लेन देन है

चीखे चिल्लाए वो जो जिंदा हो
अंगारों पे जो न भस्म हुए
वो सारे शव ही थे

अवश्य मैं गवाह इन सब का
और इतिहास कल का

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