Saturday, October 6, 2007

निवेदन....

सबसे पहले, श्री रामचरित मानस से गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ -

निज कबित्त केहि लाग न नीका | सरस होऊ अथवा अति फीका ||
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बर पुरूष बहुत जग नाहीं ||

(अच्छा या बुरा, अपना कवित्व किसे नहीं अच्छा लगता. जो दूसरों की रचनात्मकता की प्रसंशा करें, ऐसे योग्य व्यक्तित्व बहुत कम हैं.)

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रचनात्मकता समय के साथ परिवर्धित होती है, होनी भी चाहिए. यहाँ प्रस्तुत सारी रचनाएँ उसी रचनात्मकता की कडिया हैं जो मेरे साथ-साथ चलते-चलते समय के साथ परिपक्व हुई हैं. मेरे लिए लेखन जीवन की तरह ही, जीवन से जुड़ी एक प्रक्रिया है. मैं यह तो नहीं कहता (और न ही मानता हूँ) की मैं एक उत्कृष्ट लेखक हूँ. अब इनका आनन्द लेना, इनको समझना, देश और काल के साथ साथ अपकी मनः स्थिति पर निर्भर करता है. इन रचनाओं के माध्यम से मैं न तो आपको किसी "वाद" वगैरह से परिचित कराना चाहता हूँ और न ही किसी उपदेशक की भांति आपके सम्मुख स्थापित होना चाहता हूँ. मैं अपना चिंतन आप पर थोपना नहीं चाहता. जब मैं इन्हे लिख रहा था तब ये सब मेरा था, आज जब आप इन्हे पढ़ रहे हैं तो ये सब आपका है. आप इन सब का अर्थ अपने सन्दर्भ में निकलने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र हैं.

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