Sunday, October 21, 2007

जीवनचर्या

पोरों में
सहेज ली
रास्तों की गर्द

दिल में
रख ली
दिन भर की थकान

पलकों पे
ओढ़ ली
उम्र भर की नींद

खेला किये
सपनों से
और जी गए एक उम्र

इतिहास गवाह

दम तोड़ती परछाइयां
बस यही ज़िंदा हैं
मर गए वो जो जीना चाहते थे

जो गवाह थे
अब इतिहास हैं

विभीषिकाएं तो निश्शब्द नहीं
क्रंदन अवश्य निश्शब्द और निर्लज्ज ठहरे
लौट आते हैं प्रतिध्वनियों की तरह

यहाँ वहाँ रक्तपात तो
बारिश में धुल ही जायेंगे
फिर कौतूहल किस बात का
यह तो आपस लेन देन है

चीखे चिल्लाए वो जो जिंदा हो
अंगारों पे जो न भस्म हुए
वो सारे शव ही थे

अवश्य मैं गवाह इन सब का
और इतिहास कल का

Wednesday, October 10, 2007

जल बिच मीन पियासी

यह एक कहानी है. कहानी एक खानाबदोश की. एक ऐसे खानाबदोश की जो इधर उधर मारा मारा घूमता रहता है, किसी की तलाश में. किस की तलाश में.... यह उसे नहीं पता. वह तो बस घूमता रहता है. खोजता रहता है.

मैं कौन हूँ? उसने सबसे पूछा. किसी ने उत्तर न दिया. क्योंकि किसी को मालूम ही नहीं था की वह कौन है. इसी लिए सभी लोग चुप्पी साधे हुए थे. सारा शहर चुप्पी साधे था. वो थोड़ा परेशान हुआ. इसलिये नहीं की लोगों को ये नहीं पता की वह कौन था, बल्कि इसलिए की सब चुप क्यों थे. उसे प्यास लगी. उसने पानी माँगा. उसे मिला. पर उसकी प्यास नहीं बुझी. उसने और पानी माँगा. उसे इस बात पे ग़ुस्सा आया की उसकी प्यास क्यों नहीं बुझ रही. शहर के लोगों ने उसे ग़ुस्सा होते तो देखा, पर उन्हें उसके गुस्से का कारण समझ न आया. किसी ने कारण पूछा भी नहीं. सब चुप थे, पर उसे बहुत गौर से देख रहे थे. उसे अपने वहाँ उपस्थित रहने का अहसास हुआ. उसे इस बात पे और ग़ुस्सा आया.

जब राजा ने उसके गुस्से के बारे में सुना तो उसे दरबार में उपस्थित होने का हुक्म दे डाला. राजा ने उसके गुस्से का कारण पूछा. वह चुप रहा. वह चुप इसलिए रहा कि उसे अपने गुस्से का सही कारण पता ही नहीं था. राजा ने उससे कई बार पूछा. इस बार उसने चुप्पी साध ली. अब राजा के ग़ुस्सा होने की बारी थी. अब आपको तो यह पता ही है कि राजाओं को अवहेलना कतई पसंद नहीं. खैर किसी तरह उसे शायद कुछ अक्ल आई और उसने राजा को अपनी प्यास के बारे में बताया. जब राजा ने यह सुना तो उसको कतई पसंद नहीं आया. राजा को इसलिए पसंद नहीं आया कि उसने भरे दरबार में यह शिकायत कि उसकी प्यास बुझ नही रही है. राजा ने उससे उसकी न बुझाने वाली प्यास का कारण पूछा. कारण अगर उसे पता होता तो बताता. वह चुप रहा. तभी राजा ने एक फरमान निकाला और सभी दरबारी गणों ने भी हाँ मे हाँ मिलायी. "उसका सर पानी मे तब तक डुबो के रखा जाए जब तक कि उसकी प्यास बुझ न जाए. इस कार्य मे जो भी खर्च आएगा, राजकीय खजाना उसे वहन करेगा. राज्य में कोई भी न बुझने वाली प्यास नही होनी चाहिए. यह राज्य के लिए अच्छा नही है." ऐसा राजा और दरबारी गणों का आदेश था.

वह बहुत दुखी था. एक सूखे हुए नखलिस्तान के पास बैठा हुआ, काफ़ी दुखी था. सारी दुनिया को मालूम था कि वह दुखी था. उसकी प्यास के बारे में सुनकर, उसके गुस्से के दुःख के बारे में सुनकर, कुछ ज्ञानी लोगो उसके पास आए. पहले तो उन्होंने आपस मे ही उसकी प्यास और उसके बारे में काफी चर्चा की. काफी वाद विवाद किया. काफी सोच विचार किया. उससे बोले- "हमें पता है तुम्हारी न बुझाने वाली प्यास का कारण. प्यास ही क्यों, हमारे पास तो तुम्हारे सभी प्रश्नों कि चाभी है..." उसकी आंखों मे जीवन कि चमक तैर गयी. ज्ञानी लोगों ने बोलना जारी रखा - "... जो हम लोगो बोलेंगे, उसे तुम दोहराना, पूरी श्रद्धा के साथ के इश्वर कि कृपा से तुम भी हम लोगों कि तरह एक ज्ञानी पुरूष बन जाओगे और तब तुम्हे सारे प्रश्नों के उत्तर मिल ख़ुद बखुद ही मिल जायेंगे." उसने वही दोहराया जो उन ज्ञानी लोगों ने कहा. उसने शब्द पूरी कर्मठता, पूरी प्रतिबद्धता के साथ दोहराए. उसने वो शब्द पूरी श्रद्धा के साथ दोहराए जैसी कि उन शब्दों कि मांग थी. ज्ञानी जन मुस्कुराये. वह नही. ज्ञानी लोगों ने उसे बधाई दी. अब वह अपनी प्यास बुझा सकता है, ऐसा उसे उन ज्ञानी लोगों ने बताया. सारे के सारे ज्ञानी लोगो उसके चारो ओर घेरा बनाकर बैठ गए खुशी के वृन्दगान गाने लग गए. पर अब तो उसके पास और भी प्रश्न थे - "उसे अपने सारे प्रश्नों के उत्तर क्यों मिलने चाहिए?" "इन ज्ञानी लोगों से मिलने के बाद उसके अन्दर क्या परिवर्तन आ गया?" उसे तो कुछ भी महसूस नही हुआ. उसकी अंतरात्मा तो वही थी, वही सारे प्रश्न, वही अनबुझी प्यास. पर फर्क इतना था कि उसके आस पास शहर की वीरानी के बजाय खुशी से नाचते झूमते ज्ञानी लोग थे जो उसे अभी मिले हुए ज्ञान का उत्सव मना रहे थे. उसे तो सिर्फ़ इतना ही फर्क दिखायी दिया - उन ज्ञानी लोगों की संगत. कोई भी फर्क महसूस करने के लिए यह आवश्यक था कि ज्ञानी लोगों ने उससे जो भी कहा वो उसे पूरी तरह से स्वीकार कर ले. एक एक शब्द. तर्क, वाद विवाद कि कोई जगह नही, पूर्ण स्वीकृति उन शब्दों की जो उसे उन ज्ञानी लोगों ने बताये. प्रश्न कुछ थे ही नही. केवल उत्तर. उत्तर, जिनके गर्भ में प्रश्न छुपे हुए थे. ऐसे प्रश्न जिनको पूछने का अर्थ था कि उन ज्ञानी लोगों के बताये गए शब्दों कि अवहेलना करना.

वह ऊब गया था. बचपन में वह एक बहुत जिज्ञासु बच्चा था. कुछ भी नया सीखने के लिए हमेशा तैयार, तत्पर. एक खानाबदोश. पर अब तो उसे कुछ भी नया नही खोजना चाहिए. उन ज्ञानी लोगों ने उसे सभी चीजों के बारे में सब कुछ बता दिया. उसे ऐसा लगा कि वह एक कैदी बन कर रह गया है. ऐसी प्रतिबद्धता का कैदी जो उसकी कभी थी ही नही. स्वतंत्रता ही नही बची, प्रश्न खोजने की स्वतंत्रता, प्रश्न पूछने कि स्वतंत्रता और उत्तर न जानने कि स्वतंत्रता. उसे लगा कि उसका दम घुट रहा है... उसे लगा कि उसे प्यास लग रही है. उसे प्यास लगी थी. उसने आस पास देखा. ज्ञानी लोग नही दिखे. सिर्फ़ एक भीड़. भीड़ का हर एक आदमी उन ज्ञानी लोगों कि तरह बर्ताव कर रहा था. मुँह बंद, आँखों में भी चुप्पी, कोई उत्सुकता नही, जैसे कि सभी को सब कुछ आता है. वह डर गया, उसकी अंतरात्मा भी डर गई. उसने भीड़ से दूर भागने कि कोशिश भी कि, पर नाकामयाब रहा. वह भीड़ के साथ चलने लगा और जैसे ही शहर के बाहर पहुँचा वह भागने लगा, जोर से, क्षितिज कि ओर. वह बस दौड़ता गया जब तक कि समय ख़ुद न रुका, वह दौड़ता ही रहा.

वह अपने प्रश्नों और उनके उत्तरों कि खोज में इतना डूबा हुआ था कि उसे याद ही नही रहा कि जीवन का स्पंदन क्या होता है. ऊपर सर उठाया तो उसे नीला आसमान दिखा. उसके होंठों पे एक मुस्कराहट तैर गयी. उसे लगा कि ठंडे पानी उसके पैरों को छूकर उसे वापस जाने को कहा. वह फ़िर मुस्कुराया. उसके कानों में उसे अपनी ही आवाज़ गूंजती हुई सुनाई दी - "ऐसा क्या है जो मुझे वो बनाती है जो आज मैं हूँ?" और प्रत्युत्तर में उसे फिर अपनी आवाज़ सुनाई दी - "तुम्हारी मान्यतायें, तुम्हारे विश्वास, तुम्हारी प्रतिबद्धता ही तुम्हें वो बनाती है जो तुम आज हो. तुम्हें अपनी मान्यताएं बनाने का पुरा अधिकार है. हो सकता है कि तुम्हारी मान्यताएं, विश्वास तुम्हारे लिए एक मानसिक कसरत भर हो, पर यह तय करने वाले भी तुम्ही हो, क्योंकि तुम्हारा प्रतिनिधित्व, किसी भी स्तर पर, तुम्हारे सिवा कोई और कर ही नही सकता. किस मान्यता को रखना है और किसे फेंकना है, यह भी तुम ही तय करोगे, क्योंकि सबसे बड़े ज्ञानी तो तुम्ही हो. फेंकने और रखने कि कसौटी क्या है? मापदंड क्या है? मान्यताएं क्या इसी लिए स्वीकार कर ली जाएँ क्योंकि वो अभीष्ट हैं या फ़िर इस लिए फेंक दी जायें क्यों कि वे व्यक्तिगत कसौटी पर खरी नही उतरतीं? सत्य, नश्वर या शाश्वत, वही है जो सत्यापित हो सकता है, तो फ़िर भ्रम कि स्थिति क्यों, संदेह क्यों? सत्यापन कर लो. तुम्हारे सारे प्रश्नों के उत्तर तुम्हारे पास ही है. कभी किसी मन्दिर जाने की आवश्यकता नही है, कोई प्रार्थना कहने कि आवशयकता नही है, किसी पुजारी के पास जाने की या किसी संत के सामने झुकने की भी आवश्यकता नही है - उत्तर के लिए अपनी आवाज़ सुनो, अपनी अंतरात्मा से बातें करो. और अनुत्तरित प्रश्नों से परेशान होने की आवश्यकत नही है, क्यों कि वो प्रश्न तो तुम्हारे हैं ही नही."

कबीर ने लिखा है - जल बिच मीन पियासी, मोहें सुन सुन आवत हांसी. कबीर को हँसी, परिस्थिति कि विडम्बना पर आयी होगी. कबीर को हँसी उन सब पर आए होगी जो अपना सर पानी में डुबो के खड़े हैं. अब वह हँस रहा था. वह अभी भी एक खानाबदोश ही था.

Saturday, October 6, 2007

समय पिघला तो....

समय पिघला तो, बह चला
बह चली संसृति
न बहा मैं....

सब कहते हैं - योगी होगा
मैं हस देता हूँ
बहता नहीं प्रवाह में

आवृत्ति अवश्य सुनता हूँ
जीवन के स्पंदन की
पर ध्यान नहीं देता
खोया रहता हूँ उत्सव में
तुम और तुम्हारा प्रेम

विगत तुम भी आओ

कहानी

एक नई कहानी

पात्र परिचय-
मैं जो मैं नहीं
तुम जो तुम नहीं

विषय-
कुछ खास नहीं

एक नई कहानी
आरम्भ से अंत तक
अंत के बाद भी

एक लम्बी कहानी

ऋत्विक (जून २५, २००७)

तुम
संसृति की भाषा
हमारी परिभाषा

क्षणों के कोलाहल में
जीने की आशा

निवेदन....

सबसे पहले, श्री रामचरित मानस से गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ -

निज कबित्त केहि लाग न नीका | सरस होऊ अथवा अति फीका ||
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बर पुरूष बहुत जग नाहीं ||

(अच्छा या बुरा, अपना कवित्व किसे नहीं अच्छा लगता. जो दूसरों की रचनात्मकता की प्रसंशा करें, ऐसे योग्य व्यक्तित्व बहुत कम हैं.)

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रचनात्मकता समय के साथ परिवर्धित होती है, होनी भी चाहिए. यहाँ प्रस्तुत सारी रचनाएँ उसी रचनात्मकता की कडिया हैं जो मेरे साथ-साथ चलते-चलते समय के साथ परिपक्व हुई हैं. मेरे लिए लेखन जीवन की तरह ही, जीवन से जुड़ी एक प्रक्रिया है. मैं यह तो नहीं कहता (और न ही मानता हूँ) की मैं एक उत्कृष्ट लेखक हूँ. अब इनका आनन्द लेना, इनको समझना, देश और काल के साथ साथ अपकी मनः स्थिति पर निर्भर करता है. इन रचनाओं के माध्यम से मैं न तो आपको किसी "वाद" वगैरह से परिचित कराना चाहता हूँ और न ही किसी उपदेशक की भांति आपके सम्मुख स्थापित होना चाहता हूँ. मैं अपना चिंतन आप पर थोपना नहीं चाहता. जब मैं इन्हे लिख रहा था तब ये सब मेरा था, आज जब आप इन्हे पढ़ रहे हैं तो ये सब आपका है. आप इन सब का अर्थ अपने सन्दर्भ में निकलने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र हैं.