व्यर्थ बंधन काटकर
तुम मझे बाँध लो
बाहुपाश में
धरा में, जल में, वायु में,
अग्नि में, आकाश में
स्वच्छंद मन
विलग तन
अग्नि सी जलती
प्रकृति
होम कर दो चेतना
हर एक वेदना
विराट को
हों समर्पित
सभी परिभाषाएँ
पार्थिव आशाएं
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