Wednesday, November 30, 2011

Who runs the Government?

If we go by the draft of the Janlokapal Bill, the government is being run by NGOs in this country. The government wants to bring over 4.5 lakhs NGOs under the Lokapal's jurisdiction. While only over 1.7 lakhs of central government employees will be accountable to the Lokpal of this country. Even public sector companies are accountable to the Loakpal. However our MPs (including our PM) are not.

Why is that MPs' activities inside the parliament will not fall under Lokapl's jurisdiction? Are the houses' somewhere in Balochistan or Waziristan? What kind of immunity is this where these MPs are not accountable to the people of this country?

Funny thing - activists like Anna Hazare, Arvind Kejrival, Kiran Bedi, Shivendra Singh and many others will come under the Jan Lokpal. While corrupt ministers, MPs and majority of Babus will enjoy self proclaimed immunity.

If there is a fear that due to unethical behavior of the PM of this country and due to accountability towards the Lokpal, government may fall - then let the government fall. Without any consequences attached to behaviors, how do you suppose to control anything? How do you suppose to weed out corruption?

Sunday, November 27, 2011

व्यापार

एक सुबह लेकर निकला
एक शाम लेकर लौटा
दिन भर का व्यापार
अंटी में बाँध लिया

दर्शन

व्यर्थ बंधन काटकर
तुम मझे बाँध लो
बाहुपाश में
धरा में, जल में, वायु में,
अग्नि में, आकाश में


स्वच्छंद मन
विलग तन
अग्नि सी जलती
प्रकृति
होम कर दो चेतना
हर एक वेदना


विराट को 
हों समर्पित 
सभी परिभाषाएँ
पार्थिव आशाएं


पहचान

पानी बन के बरसा
बह चला हवा के संग
खुशबुओं की तरह
– बादल था




बिक गया
कौड़ियों के मोल
जैसे ज़िन्दगी
फिर भी खुश था
आदमी की तरह
– पागल था


अपने अपने सच

प्रतीक... क्या देख रहे हो? कोई अजनबी कान में फुसफुसा गया
'उ..म..म..... मैंने लगभग नींद से जागते हुए कहा नहीं कुछ नही.....बस उगते सूरज को देख रहा हूं ...।

मैने अपने आसपास देखने की कोशिश की पर कोई नजर नहीं आया।
***
दिन में कितने लोग तुम्हारी आंखों के सामने से निकल जाते हैंकिस किस को याद रखना मुमकिन होता है। सुबह घर से निकलते होशाम को लौट आते होसारा दिन लोगों से मिलते होकिसी को याद रखते हो किसी को भूल जाते हो। पर घर लौट आने के बाद ये सब कुछ कितना गैरजरूरी सा लगता है। सब कुछ कपडों के साथ खूंटी पे टांग देने वाली बात हो जैसे लेकिन परछाईं  कहाँ टंग पाती है खूँटी पर.... हमेशा साथ  रहती है - कंधे पर लदे बेताल की तरह विचारों का क्या हैआदमी अकेला हो और व्हिस्की का एक पेग हाथ में हो तोवो भी खोपड़ी  में उमडने ही लगते हैं। वैसे भी कोई प्रतिबन्ध तो है नहीं
खैर.... आजकल लोग अपने हिस्से की रोशनीहवापानी आदि आदि अपनी अपने साथ अपनी जेबों में लेकर घूमते हैं। भला ऐसे में किसी दूसरे से क्या मतलब। उनके आसपास होती है एक परिधि उनके सीमाओं की.... किसी ने अतिक्रमण किया तो लोग बिलबिला उठते हैं
''सीमायें हैं तो सही पर लोग खुश भी तो हैं और........। ''
''अगर बिलबिलाना खुशी के लक्षण हैं तो अच्छी बात है लेकिन दोस्त बात केवल अपनी खुशी की तो है नहींबात है टुकडा टुकडा जिन्दगी और सीमाओं में बटी खुशी की। क्या ख़याल है ?"
"ख़याल तो बुरा नहीं है... वैसे भी सीमायें पूरी तरह सापेक्ष हैं। कोई खुश है और कोई नहीं है। कोई मेरी सीमा लांघ कर मेरे पैर पर खड़े होकर खुश होता है तो, मैं तो बिलबिला ही जाता हूँ।"
''माना कि सीमायें सापेक्ष हैं पर व्यक्तित्व और अस्तित्व के आसपास जो कुछ सरोकार हैं उनका क्या?''
''उनका क्या? सरोकार अपनी जगह हैं और वो समझ में भी आते हैं। लेकिन आज जब सब लोग अपनी अपनी जेबों में हाथ डालकर घूम रहे हैं तो इसका भी कारण है .....कि कोई दूसरा जेब न काट ले''
***

अचानक नजर घडी पर पड ग़यी। सात बज रहे थे। सिगरेट पीने का मन हो रहा था पर जेब में रखे सूरज की याद आते ही हंसी आ गयी। तपन घर आ गया होगा। तेज कदमों से चल पडातपन बाहर बरामदे की धूप में बैठा अखबार पढ रहा था। गेट खुलने की आवाज शायद उसने सुन ली थी। सामने से अखबार हटाकर उसने मेरी तरफ देखा और फिर अखबार सामने टेबल पर रख दिया
''कोई खास खबर नहीं है क्या? '' मैंने पास पडी क़ुर्सी पर बैठते हुए पूछा।
''खास खबर तो मैं लाया हूं।''
''क्या?''
''जन्मेजय को जानते होमिश्रा की पार्टीमें मुलाकात हुई थी...।''
'हांतो...।''
''उसने आत्महत्या कर ली।''
''उहूं.... क्यों ? मेरा मतलब है... अजीब बात हैआत्महत्या टाइप का तो नहीं लगता था''
तपन कुछ नहीं बोला। परेशान दिखायी पड रहा था। वैसे भी तपन काफी इमोशनल है। पता नहीं किस किस के बारे में सोचा करता हैलोगों के अपने अपने विश्वास हैंअपनी अपनी मान्यताएं हैं जीवन और मृत्यु को लेकरजिन्दा रहने या न रहने के लोगों के पास व्यक्तिगत कारण हैंकम से कम मैं तो ऐसा ही सोचता हूं। पर तपन ऐसा नहीं सोचतामैं जानता हूं

***
''...व्यक्तिगत विश्वास का आधार क्या है? हमारे सरोकार हमें एक दूसरे से किस हद तक जोडते हैं?'' जीने का अर्थ क्या केवल कैलकुलेटर के बटन दबाने की तरह है जहां एक और एक मिलकर दो होते हैंफिर एक और एक ग्यारह करने वाले लोग भी तो हैं। हमारे सरोकार यदि व्यापक नहीं हैं तो ..... और व्यापकता की सीमा क्या है? फिर सीमाएं...।''
''बकवास है...।'' उसी अजनबी की आवाज।
***

किसी ने सही कहा है कि कुछ बातें फालतू होती हैं। अचानक तपन का चेहरा याद आ गया और फिर जन्मेजय की मौत। मुझे लगा कि जन्मेजय की मौत पर मेरी प्रतिक्रिया से तपन को मायूसी हुई हैवो चाहता था कि मैं कुछ कहूं। पर क्या? अब कहा या किया ही क्या जा सकता थामैं न तो अपने व्यक्तिगत मामलों पे किसी से बात करता हूं और न ही दूसरों के मामलों में हस्तक्षेपयदि कोई दूसरा ऐसा करता है तो मुझे पसन्द नहीं। जन्मेजय की मौत उसका नितान्त व्यक्तिगत मामला था और ऐसे में तपन मुझसे किस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हैमैं समझ नहीं पाया

***
''दुःख नहीं हुआ जन्मेजय की मौत का...?''
''नहीं अब कोई वजह भी तो होनी चाहिये।''
''इंसानियत के नाते भी नहीं...।''
''दुःख तो नहीं पर अफसोस अवश्य है।''
''किस बात का...?''
''यही कि वो एक भला अदमी था और उसे अभी और जीना चाहिये था।''
'"भले ही दोनों हाथ चौबीसों घंटे अपनी जेबों में घुसे हों?''
***
लगा कि कोई सर्द आवाज झुरझरी बनकर रीढ क़ी हड्डी में उतर गयी हो। मुझे अपने कानों में सूंऽऽऽऽ की आवाज स्पष्ट सुनायी दे रही थीमन हुआ कि पकड क़र जान से मार दूं। पर किसे?

शायद जन्मेजय ने भी यही सोचा होगा।

(written in 1995|| edited by Purnima Varman in 1999 for hindinest.com|| rewritten in 2011)

Saturday, November 19, 2011

तुम हम

तुम बैठे
हम बैठे
बस शाम गयी
युग बीता बातों में



तुम जीते
हम जीते
कोई हार नहीं
जग जीता बातों में



तुम चुप थे
हम चुप थे
कोई गीत नहीं
संगीत बहा सांसों में


विडम्बना

(एक)
हर साल की तरह
इस साल भी
ठंड में अलाव जले
फिर भी लोग
ठंड से मरे



(दो)
स्याह सलेट से

मिटा दिया सब लिखा हुआ
पोत दी सफेदीऔर
लिख दियाएक शब्द – ज़िन्दगी
कालिख से