Tuesday, August 23, 2011

What we really need!

After all the agitation against corruption, we might have a very strong law, however I would like to measure the success of any law by the effectiveness i.e. delivering the justice.
In the past we had a very strong anti terrorism law-TADA, however that did not help us in curbing the terrorism. POTA in Maharashtra is also not helping (Mumbai blasts).
Apart from setting strong laws, need of the hour is to shape our culture as well - a culture that believes in being just. Justice to all no matter what the cost is. Justice even when we have to break a few laws (including the strong ones)!

Monday, August 22, 2011

एकोऽहं बहुस्याम

प्रकृति को चलाने वाली शक्ति को आजतक भगवान के रूप में देखा गया पृथ्वी सागर और सूरज चांद को भी सदियों तक भगवान ही समझा जाता रहा लेकिन समय के साथ वैज्ञानिक खोजों ने इनके रहस्यों को जाना और आज हम उन्हें भगवान नहीं बल्कि इन्सान के एक पडोसी और सहयोगी के रूप में जानते हैं

विज्ञान की चरम सीमा को प्राप्त करने वाले इस युग में भी हम हृदय को धडक़ाने वाली और ब्रह्माण्ड को चलाने वाली शक्ति को खोजने में सफल नही हो पाये है
 धार्मिक दृष्टि से इसकी खोज हुयी है लेकिन क्या विज्ञान कभी बता पायेगा कि जो संसार को चलाता है और हमारे जन्म-मृत्यु निश्चित करता है वह कौन है और उसकी स सारी प्रक्रिया के पीछे कारण क्या है। प्रकृति में स्वतः स्फूर्त प्रक्रियाएं एक दिशा में ही आगे बढती हैं उदाहरण के लिये ऊष्मा का सदैव उच्च तापमान से निम्न तापमान की ओर वितरित होना, पानी का उच्च तल से निम्न तल की ओर बहना तथा समय का सदैव आगे की ओर ही बढते रहनाप्राकृतिक नियमों के अनुसार इन प्रक्रियाओं की दिशा नियत हैयद्यपि कोई वाह्य बल लगाकर इन प्रक्रियाओं की दिशा उलटी भी जा सकती है पर क्या समय के लिये भी ऐसा कह पाना सम्भव है या फिर विज्ञान कथाओं में ही हम वर्तमान के साथ साथ अतीत व भविष्य की रोमांचक यात्रा कर सकते हैं?

जिन कारणों से ये स्वतः स्फूर्त प्रक्रियाएं होती हैं उन्हे हम 'कारक' कहते हैं और घटना को 'प्रभाव'  प्रक्रियाओं के कारण होने वाले प्रभाव तो हम सभी को दिखते हैं पर इनको सतत आगे की ओर एक दिशा में ही बढते रहने की प्रेरणा देने वाला कारक क्या है या कौन है? विज्ञान से सदियों से यही प्रश्न पूछा जा रहा है पर प्रश्न पूछने का ढंग अलग हैचलिये अब प्रश्न पर आते हैं "इस ब्राह्माण्डिक रूपरेखा में हमारा स्थान क्या है और कहां है?" इस प्रश्न ने विज्ञान को उसकी सीमाओं का अहसास कराने में कोई कसर नहीं छोडी हैइसका कारण विज्ञान की अपनी सीमायें न होकर यह है कि यह प्रश्न जब भी विज्ञान से पूछा गयासदैव ही धार्मिक भावना के रंग में रंगकर पूछा गयाप्रश्न में कुछ जानने की जिज्ञासा की जगह एक चुनौती का पुट था यदि कुछ बता सकते हो तो बताओ नहीं तो सृष्टा, सृष्टि जिसकी कृपा का परिणाम है, के प्रति आभार करने वालों की पंक्ति में लग जाओ

''इस अनंत ब्रह्माण्ड में कहीं एक बिन्दु परएक अनावश्यक आकाशगंगा के अनावश्यक ग्रह पर हम सब क्या एक अनावश्यक धूल के कण की भांति हैं?'' खगोलशास्त्री जॉन व्हीलर स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं "नहीं, जीवन के उत्पत्ति की आवश्यकता ब्रह्माण्ड की रचना व इसी सम्पूर्ण मशीनरी के केन्द्र में स्थित है" शायद यह हमारी स्वभावगत विशेषता है कि जन्म के पश्चात जैसे ही हम अपनी आँखें खोलते हैं प्रश्न पूछना प्रारम्भ कर देते हैंहम इस विस्तृत भौतिक जगतजिससे हमारा प्रथम परिचय होता हैमें हर एक वस्तु भौतिक अभौतिक को छूना चाहते हैं और उसे अपनी कसौटी पर परखना चाहते हैं प्रथम परिचय की इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में हम जाने अनजाने स्वयं से ही यह प्रश्न पूछ बैठते हैं कि "यह सब क्या है और क्यों है?" यह आदि प्रश्न है और जब इस परिस्थिति में जब हमें अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है तो हम अपने आप को असहज पाते हैं यह वह परिस्थिति है जब हम सर्वप्रथम महसूस करते हैं जगत के रचयिता को  'कि कोई तो है वह'। भारतीय दर्शन इसे 'चेतन तत्वकहता है और साथ ही यह भी कहता है कि इसका अंश हम सबके अंदर विद्यमान है परन्तु आदि प्रश्न वैसे का वैसा ही है  पर भिन्न प्रारूप में 'वास्तव में यह चेतन तत्व क्या है?' 'इसका स्वरूप कैसा है?' 'इसका निरूपण क्या है?' आदि आदि

भारतीय दर्शन ऐसे सभी प्रश्नों को परमात्मा के परिप्रेक्ष्य में देखता है परमात्मा जो सम्पूर्णता का परिचायक है ब्रिटिश खगोलशास्त्री स्टीफन हाकिंग के अनुसार जहां एक ओर ईश्वर की अवधारणा के बिना सृष्टि के आरम्भ की व्याख्या करना अति दुरूह कार्य है वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक नियमों के आधार पर ईश्वर के कार्य कलापों की व्याख्या भी नहीं की जा सकती पर क्या हम इस सम्बन्ध में कुछ भी कहने के लिये स्वतन्त्र हैं वो भी इस मनोवैज्ञानिक सत्य को जानने के बाद भी कि हम चीजों को वैसा नहीं देखते जैसी कि वो हैं, वरन जैसे हम हैं उन्हें हम वैसा देखते हैं? क्या यह हमारी बाध्यता नहीं? हो सकता है कि ऐसा ही हो?

इस ब्रह्माण्ड में एक मात्र चेतन प्राणी होने के कारण (कम से कम हम तो ऐसा ही समझते हैं, हो सकता है कि यह सत्य न हो पर प्रथमदृष्टया तो ऐसा ही लगता है) हमने अपने कुछ अधिकार नियत किये हैं। यहां पर हम जो भी घटते हुए देखते हैं उसका अपने सन्दर्भों में निष्कर्ष निकालने के लिये स्वतंत्र हैं या कोशिश कर सकते हैं पर क्या हम दृढता पूर्वक पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि हमारे निकाले हुए निष्कर्षों पर किसी का प्रभाव या नियन्त्रण नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं कि हमारे ऊपर है

प्रश्न पूछने तथा उत्तर खोजने के दौरान एक बहुत ही अच्छा तार्किक विश्लेषण हमारे सामने आता है कि यह 'चेतन तत्व' जो कुछ भी है, हमारे इन्द्रिय जनित ज्ञान की सीमाओं से परे है इस सन्दर्भ में वैशेषिक दर्शन यह कहता है कि इन परिस्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने विचारों को वहीं तक सीमित रखें जहां तक हमारी अनुभूतियां उनसे तालमेल बिठा सकें

यदि वैचारिक सीमाओं के बारे में सोचें भी तो दो सम्भावनाएं दिखती हैं पहली यह कि ये सीमाएं कभी समाप्त ही न हों, जिसके कारण हमने इस ब्रह्माण्ड में अपनी एक जगह बनायी है और दूसरी यह कि कहीं पर ये समाप्त हों जायें दूसरी सम्भावना काफी रोचक है वैचारिक सीमाएं समाप्त कहां होंगी? किसी एक बिन्दु , एक केन्द्र पर, अनन्त घन व अनन्त सूक्ष्म, क्योंकि परिधि तो सीमाओं को ही इंगित करती है परन्तु वह बिन्दु क्या इंगित करेगा? सारी सीमाओं का अंत या फिर से नयी सीमाओं का आरम्भ या फिर दोनों कुछ भी हो यह एक विचित्र संयोग होगा  - आदि व अंत एक ही बिन्दु पर - एक नयी सृष्टि का आरम्भ

हमारे लिये हमारा अस्तित्व अति महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह कारण है जिसकी वजह से हम सभ्यता के इस पडाव पर हैं पर फिर भी हम अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने से नहीं हिचक रहे सृष्टि के आरम्भ से अब तक हमने न जाने कितने ऐसे ही प्रश्नचिह्न लगाये हैं और उनका उत्तर भी पाया है वह भी बिना यह जाने कि "सीमाओं के पार क्या है तथा सीमाओं को तोडने के प्रक्रिया में हमारी उत्तरजीविता क्या होगी" शायद इसकी परवाह हमें नहीं है । यही मानवीय स्वभाव है और इसी स्वभाव के कारण ही हमने न जाने कितनी सीमाओं पर विजय पायी है 

यद्यपि विचारों ने कभी किसी बाध्यता को नहीं माना पर मानवीय स्वभाव तो सदैव ही अनुभूतियों तथा दृष्टिकोण से घिरा रहा है जीवन एक स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया का विश्लेषण करने से पूर्व हमें अपनी अनुभूतियों तथा दृष्टिकोण दोनों में व्यापकता लानी होगी पर यह तो निश्चित ही है कि कोई तो है वह कारक जिसने कभी सोचा था एकोऽहं बहुस्याम

Saturday, August 20, 2011

Synthetic Anger?

I am extremely sorry if I come across as a cynic - but is the anger shown across the country over corruption real?

Or is it a result of a generation being completely bored of regular entertainment on the MTv and Bindaas and now the attention is shifted to the news channels? Looks like the current Emotional Atyachaar is more entertaining (somebody should ask our catatonic PM).

Something similar (on the feelings and anger front) happend when "Rang de basanti" was released in multiplexes. Whoever came out of the theater, was quite angry and wanted to bring a revolution in the country as some on-screen characters were killed in cold blood by the corrupts of this country.
But by the time they reached home, the anger had given way to the depression and ultimately to the indifference - "people who are most affected do not really care, why should l? Sweet dreams!"

Did you hear this - the guy after protesting against the corruption, while returning back home (sweet home), bribed the cop as he'd jumped the signal and the cop was in no mood to give the receipt for the penalty?

A nation in a hurry to grow, go ahead.... who has the time to think what is right and do the right thing. Or is it cultural?

India against corruption

I was reading an article on the net how dalit leaders are against the current anti corruption agitation started by Anna Hazare. Their reason, the whole movement its anti dalit, the language that is being used all over the country aswell as in the Ramleela ground is brahminical. Well, what I was thinking (not that I think a lot or my thinking masters a lot!) any anti corruption law is going to benefit all and the maximum benefit will be for poor of this country. In the name of poor of this country, we have maximum number of programs (NAREGA to name one) and the money is being pocketed by the powerfuls (irrespective of their casts).
Dalit leaders of this country have their own reason to oppose a movement like the current one: since Dr. Ambedkar was against satyagraha driven by fasting. On many occasions, he had criticized Gandhi and his supporter got that.

I guess, these dalit leaders have to rethink on what they are saying and thinking. Ideologies cannot be permanent, they age and in today's world they age quite fast, whether you like it or not.