Sunday, March 13, 2016

ग़ज़ल

नसीहतें न मिलें तो हम पे भी रहे जवानी का असर
मौज-ए-दरिया में रहे देर तलक पानी का असर

चलो रुक के बुला लें इस जमाने के ख़ुदाओं को
क्या पता कल रहे न रहे उनकी नादानी का असर

कैफ-ए-मसर्रत को जुनूं बनने दो आज की शाम
कौन जाने किस घड़ी ख़त्म हो नौजवानी का असर

गर उनके चेहरे की इबारत फरेब-ए-नज़र थी
तो मुमकिन है कल भी रहे इसी नातवानी का असर

ग़ज़ल

वो एक बात ही थी कि सब क़त्ल हो गए
वरना खंजरों से कौन मरा करते हैं

हमें तो डर है सिर्फ उनकी नज़रों के कहर का
वरना इस ज़माने से कौन डरा करते हैं

समेट लाया हूँ दुनिया की गर्द, फिर भी
गहरे पुराने घाव हैं यूं ही नहीं भरा करते हैं