तुम कितना भी पुकारो
मैं न आऊंगा
जो सोचा, वही बोला, किया
एक जीवन, तर्कों से परे
आसक्ति की मदिरा पी मन बाध्य है
नेह नैनों का तुम्हारे
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा
छद गया तीरों से तन
बिंध गयी आत्मा
यह पीड़ा प्रेम की असाध्य है
मुक्ति माधव! तुम्हारी तरह
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा
तुम कितना भी पुकारो
मैं न आऊंगा
मैं न आऊंगा
जो सोचा, वही बोला, किया
एक जीवन, तर्कों से परे
आसक्ति की मदिरा पी मन बाध्य है
नेह नैनों का तुम्हारे
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा
छद गया तीरों से तन
बिंध गयी आत्मा
यह पीड़ा प्रेम की असाध्य है
मुक्ति माधव! तुम्हारी तरह
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा
तुम कितना भी पुकारो
मैं न आऊंगा
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