भोर के तारे को विदा कर
रोशनी खिलने लगी
ज़िद्दी सूरज फिर पूरब से ही उगा
और यूँ ही धूप चढ़ने लगी
दो चार जमुहाइयों के बाद
भूख भी लगने लगी
रोशनी खिलने लगी
ज़िद्दी सूरज फिर पूरब से ही उगा
और यूँ ही धूप चढ़ने लगी
दो चार जमुहाइयों के बाद
भूख भी लगने लगी
No comments:
Post a Comment