Wednesday, July 29, 2015

चाह यही

चाह यही
बन पराग उड़ जाऊं
खुशबू संग
बस जाऊं तेरे मन में

वैराग्य न लूंगा
तप अवश्य करता हूँ
नाम तेरा ही सुमिरन कर
जप करता हूँ
चाह यही कि विघटित हो जाऊं
कण कण में
बस जाऊं तेरे मन में

मैं मृत्युञ्जय!
चाह नहीं बनने की
ना ही कोई
नया इतिहास रचने की
चाह यही बस कवलित हो जाऊं
पल पल में
बस जाऊं तेरे मन में

Tuesday, July 7, 2015

एक खुशी चोरी की

एक जेब में धूप
एक में पानी
टोकरी में आसमान
लेकर मैं खुश था


एक सुबह लेकर निकला
एक शाम लेकर लौटा
दिन भर जो व्यापार किया
शाम की अंटी में बांध लिया


एक सुबह नम थी
आसमान थोड़ा सा झुका था
मैंने उचक के सूरज तोड़ लिया
दूसरा सूरज उगा या नहीं
यह तो पता नहीं पर मैं खुश हूँ