Saturday, April 11, 2015

मैं न आऊंगा

तुम कितना भी पुकारो
मैं न आऊंगा


जो सोचा, वही बोला, किया
एक जीवन, तर्कों से परे
आसक्ति की मदिरा पी मन बाध्य है
नेह नैनों का तुम्हारे
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा

छद गया तीरों से तन
बिंध गयी आत्मा
यह पीड़ा प्रेम की असाध्य है
मुक्ति माधव! तुम्हारी तरह
मैं भले न पाऊंगा पर मैं न आऊंगा


तुम कितना भी पुकारो
मैं न आऊंगा

Friday, April 10, 2015

कुछ टूटा कुछ गुम गया

पत्थर टूटा ­
आह छिटक कर
बह निकली
आँखों के समंदर से

नज़र उठी ­
नज़रों में उतरकर
गुम हो गयी
दिल के बवंडर में