Wednesday, April 4, 2012

ख़बर

ज़िन्दगी का अर्थ ढूँढते हुए
ज़िन्दगी कब बेमानी हो जाती है
इसका पता ही नहीं चलता

सरोकार और विडंबनाओं 
के बीच फंसा आदमी
आदमी की तलाश में 
कब निकल पड़ता है
इसका पता तब तक नहीं चलता
जब तक कि -
"गुमशुदा कि तलाश है"
खबर अखबारों में 
छप नहीं जाती

(Aug 20, 1996)


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