Sunday, October 17, 2010

प्रेम: चार कवितायेँ

1
परिभाषा
बाँधती है, निश्चित करती है
सीमाएं
अपरिभाषित प्रेम के बंधन में
हम और तुम



2
आवश्यकता क्या है
शब्दों की
चलो अवयक्त को बांचते हैं
मौन की भाषा में
नियंता के साथ



3
धूप की परछाइयों में
बैठें हैं हम और तुम
एक दूजे के अकेलेपन में गुम
साथ में
उत्सव का अहसास





4
परिणाम
परिणिति या नियति
सोचकर
क्या किसी ने
वास्तव में प्रेम किया है

Saturday, October 16, 2010

याद

यादों की
बरफी बनाई

चख के देखी
.... मीठी थी

बेच ली