ऐ मेरे दोस्त!
कि कैसे कटी ये ज़िन्दगी
नए नए आयामों के
नित पाये जंगल कितने
नहीं मिली तो
नहीं मिली
वो पतली जिद्दी पगडंडी
सांस-सांस लड़ते रहे
सांस-सांस हारा किए
आयी, न आयी
कोई अजान
बस होती रही बंदगी
पल-पल, क्षण-क्षण
दिन और रात
कौड़ी कौड़ी परखा किए
मरने की आरज़ू लिए
चल गए एक ज़िंदगी
मत पूछो मुझसे
ऐ मेरे दोस्त!
कि कैसे कटी ये ज़िन्दगी